प्रश्नकर्त्ता अक्सर पूछते हैं- “क्या रत्न धारण करने से ग्रह अनुकूल होते हैं?
रत्नों का जीवन पर प्रभाव हजारों वर्षों के अनुसंधान से ज्ञात किया गया है। यह लौकिक अनुभूति की चीज नहीं है। इसे धारण करने वाला ही समझ सकता है। यह उसी तरह का प्रभाव देता है जैसे चुम्बक लोहे पर। चुम्बक लोहा नहीं है, लोहे का कोई रिश्तेदार भी नहीं है। चुम्बक निकिल हो सकता है, क्रोमियम हो सकता है, कोबाल्ट हो सकता है, मृदा तत्व हो सकता है या कोई धातु जिसके चारों तरफ तार लपेटकर करंट दौड़ा दी जाएं, वह धातु अस्थायी तौर पर चुम्बक की तरह काम करने लग सकती है!
आप सोचिये कि अगर चुम्बक का अविष्कार नहीं हुआ होता तो बिजली का भी अविष्कार नहीं हो पाता। जबकि प्रकृति में बिजली पहले से मौजूद थी। बिजली बनाई नहीं गयी बल्कि ऊर्जा के रूपांतरण से ट्रांसफॉर्म की गयी।
भौतिक तौर पर चुम्बक का प्रभाव तो देखा जा सकता है लेकिन रत्नों का प्रभाव अनुभूति का विषय है। रत्न हजारों वर्षों की शोध का नतीजा हैं। हमारी वैदिक एस्ट्रोलॉजी ने पूरे विश्व को रत्नों का महत्व समझाया है। सबसे पहले रत्नों का प्रयोग हमारे यहां ही शुरू हुआ। श्रीकृष्ण, जिनका वृष लग्न था, उन्होंने श्यामन्तक मणि (हीरे) के लिये क्या क्या उद्यम नहीं किये! कोहिनूर जिन्हें लाभकारी सिद्ध हुआ उन्होंने शक्तिशाली साम्राज्य स्थापित किया और जिन्हें हानिकारक रहा वह साम्राज्य तबाह हो गये।
हमारी रत्नों की एस्ट्रोलॉजिकल रिसर्च को समूचा विश्व मानता है। वेस्टर्न एस्ट्रोलॉजी भी उन्ही रत्नों का सजेशन सबसे ज्यादा देती है जिन्हें हम हजारों सालों से प्रयोग करते आ रहे हैं। जब हमारे यहां रत्नों के प्रभाव पर शोध हो रहा था तब दुनिया उन्हें कंकड़-पत्थर समझती थी। रत्न प्रकृति प्रदत्त मूल्यवान निधियां हैं। अपनी दैवीय शक्ति के प्रभाव के कारण रोगों का निवारण भी करते हैं साथ ही हमारी सुख समृद्धि के लिये भी सहायक होते हैं।
रत्न मूलतः दो प्रारूपों में पाए जाते हैं- जैविक व खनिज। जैविक रत्न वह हैं जो प्रकृति में जैविक संरचना से प्राप्त होते हैं, जैसे- मूंगा और मोती। खनिज रत्न वह हैं जो खनन के द्वारा निकाले जाते हैं, जैसे- हीरा, पन्ना, माणिक्य और पुखराज।